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हेलो दोस्तो! पिछले अध्याय में हम पर्यायवाची शब्द के बारे में जान गए हैं। आज इस लेख में हम अधिक से अधिक अ से औ तक वर्ण का क्रमानुसार पर्यायवाची शब्द पढेंगे।


वर्ण क्रमानुसार पर्यायवाची शब्द 

आइए स्वरों जैसे अ, आ, इ, ई .... औ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द पढ़ते है।

अ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • अंधकार – तम, तमस, अंधियारा, तिमिर, अँधेरा।
  • अपमान – अनादर, अवज्ञा, अवहेलना, तिरस्कार।
  • अलंकार – आभूषण, गहना, जेवर।
  • अहंकार – दंभ, अभिमान, दर्प, मद, घमंड।
  • अमृत – सुधा, अमिय, पीयूष, सोम।
  • असुर – दैत्य, दानव, राक्षस, निशाचर, रजनीचर, दनुज, रात्रिचर, तमचर।
  • अतिथि – मेहमान, अभ्यागत, आगन्तुक।
  • अनुपम – अपूर्व, अतुल्य, अनोखा, अद्भुत, अनन्य।
  • अर्थ – धन, द्रव्य, मुद्रा, दौलत, वित्त, पैसा।
  • अश्व – हय, तुरंग, घोड़ा, घोटक, बाजि, सैन्धव।
  • अंतर- भिन्नता, असमानता, भेद, फर्क।
  • अंतर्धान- गायब, लुप्त, ओझल, अदृश्य।
  • अंदर- भीतर, आंतरिक, अंदरूनी, अभ्यंतर।
  • अंदाज- अंदाजा, अटकल, कयास, अनुमान।


आ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • आत्मा – जीव, चैतन्य, चेतनतत्तव, अंतःकरण।
  • आग – अनल, हुतासन, पावक, कृशानु, वहनि, शिखी, वह्नि।
  • आकाश – नभ, गगन, अम्बर, व्योम, आसमान, अर्श।
  • आनंद – हर्ष, सुख, आमोद, मोद, प्रमोद, उल्लास।
  • आम – रसाल, आम्र, सौरभ, अमृतफल।
  • आश्रम – कुटी, विहार, मठ, संघ, अखाड़ा।


इ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • इच्छा – अभिलाषा, चाह, कामना, लालसा, मनोरथ, आकांक्षा, अभीष्ट।
  • इन्द्र – सुरेश, सुरेन्द्र, देवेन्द्र, सुरपति, शक्र, पुरंदर, देवराज, महेन्द्र, शचीपति।
  • इन्द्राणि – इन्द्रवधू, मधवानी, शची, शतावरी, पोलोमी।
  • इंसान- मनुष्य, आदमी, मानव, मानुष।
  • इंसाफ- न्याय, फैसला, अद्ल।
  • इजाजत- स्वीकृति, मंजूरी, अनुमति।
  • इज्जत- मान, प्रतिष्ठा, आदर, आबरू।
  • इनाम- पुरस्कार, पारितोषिक, बख्शीश।
  • इलजाम- आरोप, लांछन, दोषारोपण, अभियोग।


ई से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • ईश्वर- परमपिता, परमात्मा, प्रभु, ईश, जगदीश, भगवान, परमेश्वर, जगदीश्वर, विधाता।
  • ईख- गन्ना, ऊख, इक्षु।
  • ईप्सा- इच्छा, ख्वाहिश, कामना, अभिलाषा।
  • ईमानदारी- सच्चा, सत्यपरायण, नेकनीयत, सत्यनिष्ठ।
  • ईर्ष्या- विद्वेष, जलन, कुढ़न, ढाह।
  • ईसा- यीशु, ईसामसीह, मसीहा।
  • ईहा- मनोकामना, अभिलाषा, इच्छा, आकांक्षा, कामना।


उ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • उपवन- बाग़, बगीचा, उद्यान, वाटिका, गुलशन।
  • उक्ति- कथन, वचन, सूक्ति।
  • उग्र- प्रचण्ड, उत्कट, तेज, महादेव, तीव्र, विकट।
  • उचित- ठीक, मुनासिब, वाज़िब, समुचित, युक्तिसंगत, न्यायसंगत, तर्कसंगत, योग्य।
  • उच्छृंखल- उद्दंड, अक्खड़, आवारा, अंडबंड, निरकुंश, मनमर्जी, स्वेच्छाचारी।
  • उजड्ड- अशिष्ट, असभ्य, गँवार, जंगली, देहाती, उद्दंड, निरकुंश।
  • उजला- उज्ज्वल, श्वेत, सफ़ेद, धवल।
  • उजाड- जंगल, बियावान, वन।
  • उजाला- प्रकाश, रोशनी, चाँदनी।
  • उत्कष- समृद्धि, उन्नति, प्रगति, प्रशंसा, बढ़ती, उठान।
  • उत्कृष्ट- उत्तम, उन्नत, श्रेष्ठ, अच्छा, बढ़िया, उम्दा।
  • उत्कोच- घूस, रिश्वत।
  • उत्पति- उद्गम, पैदाइश, जन्म, उद्भव, सृष्टि, आविर्भाव, उदय।
  • उद्धार- मुक्ति, छुटकारा, निस्तार, रिहाई।
  • उपाय- युक्ति, साधन, तरकीब, तदबीर, यत्न, प्रयत्न।
  • उज्र- ऐतराज, विरोध, आपत्ति।
  • उत्थान- उत्कर्ष, प्रगति, उन्नयन।
  • उत्साह- उमंग, जोश, उछाह।
  • उदार- फ़राख़दिल, क्षीरनिधि, दरियादिल, दानशील, दानी।
  • उदाहरण- मिसाल, नजीर, दृष्टांत।
  • उद्दंड- ढीठ, अशिष्ट, बेअदब, गुस्ताख़।
  • उद्देश्य- लक्ष्य, प्रयोजन, मकसद।
  • उद्यान- बगीचा, बाग, वाटिका, उपवन।
  • उन्नति- प्रगति, तरक्की, विकास, उत्कर्ष।
  • उपकार- भेंट, नजराना, तोहफा।
  • उपहास- परिहास, मजाक, खिल्ली।
  • उपानह- खड़ाऊँ, पनही, पादुका, पदत्राण।
  • उमा- गौरी, गौरा, गिरिजा, पार्वती, शिवा, शैलजा, अपर्णा।
  • उम्मीद- आशा, आस, भरोसा।
  • उर- हृदय, दिल, वक्षस्थल।
  • उरग- सर्प, साँप, नाग, फणी, फणधर, मणिधर, भुजंग।
  • उलूक- उल्लू, चुगद, खूसट, कौशिक, घुग्घू।
  • उषा- सुबह, भोर, भिनसार, अलस्सुबह, ब्रह्ममुहूर्त।
  • उष्णीष- मुंड़ासा, पगड़ी, साफा, पाग, मुरेठा।


ऊ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • ऊँचा- तुंग, उच्च, बुलंद, गगनस्पर्शी।
  • ऊँट- करभ, उष्ट्र, लंबोष्ठ, साँड़िया।
  • ऊखल- ओखली, उलूखल, कूँडी।
  • ऊसर- अनुपजाऊ, बंजर, अनुर्वर, वंध्य।
  • ऊधम- उपद्रव, उत्पात, धूम, हुल्लड़, हुड़दंग, धमाचौकड़ी।


ऋ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • ऋक्ष- भालू, रीछ, भीलूक, भल्लाट, भल्लूक।
  • ऋक्षेश- चंद्रमा, चंदा, चाँद, शशि, राकेश, कलाधर, निशानाथ।
  • ऋण- कर्ज, कर्जा, उधार, उधारी।
  • ऋतुराज- बहार, मधुमास, वसंत, ऋतुपति, मधुऋतु।
  • ऋषभ- वृष, वृषभ, बैल, पुंगव, बलीवर्द, गोनाथ।
  • ऋषि- साधु, महात्मा, मुनि, योगी, तपस्वी।
  • ऋष्यकेतु- कामदेव, मकरकेतु, मकरध्वज, मदन, मनोज, मन्मथ।


ए से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • एकतंत्र- राजतंत्र, एकछत्र, तानाशाही, अधिनायकतंत्र।
  • एकदंत- गणेश, गजानन, विनायक, लंबोदर, विघ्नेश, वक्रतुंड।
  • एतबार- विश्वास, यकीन, भरोसा।
  • एषणा- इच्छा, आकांक्षा, कामना, अभिलाषा, हसरत।
  • एहसान- कृपा, अनुग्रह, उपकार।


ऐ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • ऐंठ- कड़, दंभ, हेकड़ी, ठसक।
  • ऐब- खामी, खराबी, कमी, अवगुण।
  • ऐयार- धूर्त, मक्कार, चालाक।
  • ऐहिक- सांसारिक, लौकिक, दुनियावी।
  • ऐक्य- एकत्व, एका, एकता, मेल।
  • ऐश्वर्य- समृद्धि, विभूति।


ओ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • ओज- तेज, शक्ति, बल, चमक, कांति, दीप्ति, वीर्य।
  • ओंठ- ओष्ठ, अधर, लब, होठ।
  • ओला- हिमगुलिका, उपल, करका, हिमोपल।
  • ओस- नीहार, तुहिन, शबनम।
  • ओहार- आवरण, परदा, आच्छादन।


औ से शुरू होने वाले शब्दों के पर्यायवाची शब्द

  • औचक- अचानक, यकायक, सहसा।
  • औरत- स्त्री, जोरू, घरनी, महिला, मानवी, तिरिया, नारी, वनिता, घरवाली।
  • औचित्य- उपयुक्तता, तर्कसंगति, तर्कसंगतता।
  • औलाद- संतान, संतति, आसऔलाद, बाल-बच्चे।
  • औषधालय- चिकित्सालय, दवाखाना, अस्पताल।
उम्मीद करता हूँ की आपको यह लेख वर्णक्रमानुसार पर्यायवाची शब्द अच्छा लगा होगा। यदि किसी प्रकार की समस्या है तो कमेंट करके हमे बताये।

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Paryayvachi shabd ki paribhasha: हेलो दोस्तो! आज हम इस लेख में पर्यायवाची शब्द के बारे में पढेंगे। जैसे कि पर्यायवाची शब्द क्या है, परिभाषा, और प्रकार के बारे में विस्तृत पढेंगे।


पर्यायवाची शब्द क्या है | Paryayavachi Shabd kya hai

किसी शब्द-विशेष के लिए प्रयुक्त समानार्थक शब्दों को पर्यायवाची शब्द कहते हैं। यद्यपि पर्यायवाची शब्द समानार्थी होते हैं किन्तु भाव में ये एक-दूसरे से किंचित भिन्न होते हैं।


अर्थात जिन शब्दों के अर्थ में समानता होती है, उन्हें समानार्थक, या पर्यायवाची शब्द कहते हैं।

जैसे :-

पावक का पर्यायवाची- कृशानु, हुताशन, वैश्वानर, शुचि, ज्वाला, आग, अनल।

मुँह का पर्यायवाची- चेहरा, मुखड़ा, आनन, मुख।


पर्यायवाची कितने प्रकार की होती है

पर्यायवाची को तीन भागों में बांटा जा सकता है।

1. पूर्ण पर्याय

2. पूर्णा पूर्ण पर्याय

3. अपूर्ण पर्याय


1. पूर्ण पर्याय पर्यायवाची शब्द :-

वाक्य में यदि एक शब्द के स्थान पर दूसरा शब्द रखा जा सके और अर्थ में कोई अंतर नहीं पड़ता हो, तो यह उसका पूर्ण पर्याय है। जैसे- जलज,वारिज।


2. पूर्णा पूर्ण पर्याय पर्यायवाची शब्द :-

जो एक प्रसंग में तो पूर्ण पर्याय हो, किंतु दूसरे प्रसंग में समानार्थक ना रह पाए, जैसे- कपड़े टांगना के स्थान पर कपड़े लटकाना कह दे तो वही अर्थ प्राप्त होता है, परंतु वह मुंह लटकाए बैठा है किस स्थान पर वह मुंह टांगे बैठा है नहीं कर सकते।


3. अपूर्ण पर्याय पर्यायवाची शब्द :-

समानार्थक शब्दों में अर्थ भेद।

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आज इस लेख में हम छंद के बारे में पढेंगे जैसे- छंद की परिभाषा, अंग तथा भेद इत्यादि। चलिये सबसे पहले छंद का मतलब जान लेते हैं।

छंद क्या है | Chhand kya hai

छंद शब्द संस्कृत के छिदि धातु से बना है छिदि का अर्थ है ढकना, आच्छादित करना। सर्वप्रथम छंद की चर्चा ऋग्वेद में आई है। छंद वह सुंदर आवरण है जो कविता-कामिनी के शरीर को ढक कर उसके सौंदर्य में वृद्धि करता है।

छंद की परिभाषा, अंग तथा भेद


छंद की परिभाषा 

जिन रचनाओं में वर्ण, मात्रा, यति, गति, तुक आदि पर बल दिया जाता है वे छंद कहलाते हैं।

अक्षरों की संख्या एवं क्रम मात्रा, गणना तथा यति- गति से संबंधित विशिश्ट नियमों से नियोजित पद रचना छंद कहलाती है। आइये अब यह जान लेते हैं कि छंद के कितने अंग होते हैं।


छंद के अंग | Chhand ke ang

छंद के सात अंग होते हैं जो निम्नलिखित है।

  1. वर्ण
  2. मात्रा
  3. यति
  4. गति
  5. तुक
  6. लघु और गुरु
  7. गण

1. वर्ण क्या है

वर्ण ही अक्षर कहलाते हैं। यह एक छोटी सी आवाज है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता।

वर्ण के दो भेद होते है।

(I)- लघु/ह्रस्व स्वर- जिसका उच्चारण करने में कम समय (एक मात्रा का समय) लगता है, उसे लघु/ह्रस्व स्वर कहा जाता है

जैसे :- अ, इ, उ,ऋ।


(II)- दीर्घ स्वर- जिन के उच्चारण में लघु स्वर से अधिक समय (दो मात्रा का समय) लगता है उसे दीर्घ स्वर कहते हैं।

जैसे :- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।


2. मात्रा क्या है

किसी स्वर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसे मात्रा कहते हैं।


3. यति क्या है

श्लोकों को पढ़ते समय अनेक स्थानों पर विराम लेना पड़ता है, वही विराम स्थलों को यति कहा गया है।


4. गति क्या है

 छंदों को पढ़ते समय प्रवाह की अनुभूति होती है जिसे गति कहा जाता है।


5. तुक क्या है

छंदों को पदान्त में जो अक्षरों की समानता पाई जाती हैं, उन्हें "तुक" कहते हैं। तुक दो प्रकार के होते हैं।

i. तुकांत

ii.अतुकांत।


6.लघु और गुरु क्या होता है

छंद शास्त्र में ह्रस्व को लघु और दीर्घ को गुरु कहते हैं।


7. गण क्या है

गुरु के क्रम को बनाए रखने के लिए गणों का उपयोग किया जाता है। तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं। गणों की संख्या 8 है जो हैं- यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण। 


छंद के भेद | छंद के कितने भेद होते हैं

वर्ण और मात्रा के विचार से छंद के चार भेद हैं जो निम्नलिखित है।

(I) मात्रिक छंद

(ii) वर्णिक छंद

(iii) उभय छंद

(iv) मुक्तक छंद


(I) मात्रिक छंद किसे कहते हैं

मात्राओं की गणना के आधार पर जिस पद्य की व्यवस्था की जाती है, उसे एकात्मक पद (मात्रिक छंद) कहते हैं।

इन श्लोकों में मात्राओं की समानता के नियम का पूरा ध्यान रखा जाता है, लेकिन अक्षरों की समानता का ध्यान नहीं रखा गया है। ऐसे श्लोक मात्र श्लोक कहलाते हैं।


(ii) वर्णिक छंद किसे कहते हैं

वर्ण गणना के आधार पर रचित श्लोक वर्णिक छन्द कहलाता है। इन शब्दों में वर्णों की संख्या और नियम का ध्यान रखा जाता है।

छंद और वर्णानुक्रम में तीन अंतर हैं।

मात्रिक और वर्णिक छंदों के तीन- तीन भेद हैं

1. सम

2. अर्द्ध सम

3. विषम


1. सम - जिस पद में चारों चरणों में मात्राओं अक्षरों की संख्या समान हो, वह साम कहलाता है।

जैसे :- चौपाई।


2. अर्द्ध सम - जिस छंद के प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ चरणों में मात्राओं अथवा वर्णों की संख्या बराबर होती है, उसे अर्द्ध सम कहते हैं।

जैसे :- दोहा, सोरठा, वरवै आदि।


3. विषम- जिस छंद में 4 से अधिक 6 चरण हों तथा प्रत्येक चरण में मात्राएं अथवा वर्णों की संख्या भिन्न भिन्न हो उसे विषम कहते हैं।

जैसे :- छप्पय, कुंडलिया आदि।


(iii) उभय छंद क्या है

गणों में वर्णों का बधा होना मुख्य विशेषता होने के कारण इसे उभय श्लोक कहा जाता है। इन श्लोकों (छंदों)  में मात्रा और चरित्र दोनों की समानता बनी हुई है।


(iv) मुक्तक छंद क्या है

अनिश्चित, आसमान, मुक्त गति और चरणों की भावात्मक लय ही मुक्तक छंद हैं।


हिंदी के कुछ प्रमुख छंद

हिंदी के कुछ प्रमुख छंद निम्नलिखित है

1. चौपाई क्या होता है

यह एक  सम मात्रिक छंद (समान श्लोक) है। इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। पहले श्लोक की कविता दूसरे श्लोक से मिलती है और तीसरे श्लोक का छंद चौथे श्लोक से मिलता है। यति प्रत्येक चरण के अंत में होती है।

चौपाई के उदाहरण :-

जय हनुमान ग्यान गुन सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर।

राम दूत अतुलित बलधामा।

अंजनि पुत्र पवन सुत नामा।


2. रोला छंद क्या होता है

रोला एक सम मात्रिक छंद है, जिसमें प्रत्येक चरण में 24 मात्राएं हैं और 11 और 13 पर यति है। प्रत्येक चरण के अंत में दो गुरु या दो लघु अक्षर होते हैं। कविता दो चरणों में आवश्यक है।

रोला छंद के उदाहरण:-

नित नव लीला ललित ठानि गोलोक अजिर में।

रमत राधिका संग रास रस रंग रुचिर में। ।


3. हरिगीतिका छंद क्या होता है

यह एक सम मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 28 मात्राएं होती है। यति 16 और 12 पर होती है तथा अंत में लघु और गुरु का प्रयोग होता है।

हरिगीतिका छंद के उदाहरण :-

कहते हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गये।

हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गये पंकज नये।


4. दोहा छंद क्या होता है

दोहा छंद एक अर्द्ध सम मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (पहले और तीसरे) में 13-13 और सम चरणों (दूसरे और चौथे) में 11-11 मात्राएं होती हैं।

दोहा छंद के उदाहरण :-

मेरी भव बाधा हरो, राधा नागर सोय।

जा तन की झाई परे, स्याम हरित दुति होय। ।

इसके दूसरे और चौथे चरण में के अंत में गुरु-लघु होता है। पहले और तीसरे चरण के आरंभ में जगण नहीं होता है।


5. सोरठा छंद क्या होता है

सोरठा एक अर्द्ध सम मात्रिक छंद (श्लोक) है। यह दोहे का उल्टा है। इसकी विषम अवस्थाओं में 11-11 मात्राएँ और सम अवस्थाओं में 13-13 मात्राएँ होती हैं। सोरठा  छंद में तुक पहले और तीसरे चरण में है।

सोरठा छंद के उदाहरण :-

कुंद इंदु सम देह, उमा रमन करुना अयन।

जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मर्दन मयन॥


6. वरवै छंद क्या होता है

यह अर्द्ध सम मात्रिक छंद (श्लोक) है। इसके विषम चरणों में 12-12 और सम चरणों में 7-7 मात्राएं होते हैं। यति प्रत्येक चरण के अंत में होती है।

वरवै छंद के उदाहरण :-

वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार।

सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार॥


7. कुंडलिया क्या होता है

कुंडलिया एक विषम मात्रिक संयुक्त छंद (श्लोक) है जिसमें चार चरण हैं। इसमें एक दोहा और एक रोला होता है। दोहे का चौथा श्लोक रोला के पहले श्लोक में दोहराया जाता है और दोहे का केवल पहला शब्दांश रोला के अंत में आता है। इस प्रकार जिस शब्द से कुंडली की शुरुआत होती है, उसी के साथ उसका अंत भी होता है।

कुण्डलिया के उदाहरण :-

साईं अपने भ्रात को, कबहुं न दीजै त्रास।

पलक दूर नहिं कीजिये, सदा राखिये पास।

सदा राखिये पास, त्रास, कबहु नहिं दीजै।

त्रास दियौ लंकेश ताहि की गति सुन लीजै।

कह गिरिधर कविराय, राम सों मिलिगौ जाई।

पाय विभीशण राज, लंकपति बाजयो साईं।


8. छप्पय क्या होता है

यह एक विषम मात्रिक श्लोक है। इसमें 6 चरण होते हैं - छप्पय में उलाला के सम-विषम चरणों का योग 15+13=28 मात्राओं के साथ अधिक प्रचलित है।

छप्पय के उदाहरण :-

जहाँ स्वतंत्र विचार न बदले मन में मुख में।

जहाँ न बाधक बनें, सबल निबलों के सुख में।

सब को जहाँ समान निजोन्नति का अवसर हो।

शांतिदायिनी निशा हर्ष सूचक वासर हो।

सब भाँति सुशासित हों जहाँ समता के सुखकर नियम।

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Hindi Ras ke prakar :  पिछले अध्याय में हमने रस की परिभाषा तथा अंग पढ़ा। इस लेख के हम रस के प्रकार के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे। चलिये शुरू करते हैं।

रस के प्रकार |  Ras ke Prakar

रसों की संख्या 9 है। वास्तव में रस नौ ही प्रकार के होते हैं परन्तु वात्सल्य एवं भक्ति को भी रस माना गया हैं इसलिए रसों की संख्या 11 हो जाती है।
  1. श्रंगार रस
  2. हास्य रस
  3. वीर रस
  4. करुण रस
  5. शांत रस
  6. अदभुत रस
  7. भयानक रस
  8. रौद्र रस
  9. वीभत्स रस
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस

1. श्रृंगार रस की परिभाषा

श्रृंगार रस में नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस के अवस्था में पहुंच जाता है तो वह श्रृंगार रस कहलाता है। इसका स्थायी भाव रति होता हैं। श्रृंगार रस को "रसराज" भी कहा जाता है।

श्रृंगार रस के उदाहरण :-

तरनि तनुजा तट तमाल तरुवर बहु छाये।
झके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाये।।

2. हास्य रस की परिभाषा

जहां कुछ अजीब स्थितियों या परिस्थितियों के कारण हास्य उत्पन्न होता है, उसे हास्य रस कहा जाता है।  इसकी स्थायी भावना हास (कम) हो जाती है।

हास्य रस के उदाहरण :-

विंध्य के वासी उदासी, तपोव्रत धारी महा बिनु नारि दुखारे,
गौतमतीय तरी तुलसी सो कथा सुनि भे मुनिवृन्द सुखारे।
है है शिला सब चंद्र मुखी, परसे पद मंजुल कंज तिहारे,
कीन्हीं भली रघुनायक जू कंरूणा करि कानन कौ पग धारे। ।

3. वीर रस की परिभाषा

जब युद्ध या कठिन कार्य को करने के लिए मन में जो उत्साह की भावना जागृत होती है उसे ही वीर रस कहा जाता है। वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है।

वीर रस के उदाहरण :-

साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धारि
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
भूषन भनत नाद बिहद नगारन के
नदी नाद मद गैबरन के रलत हैं।।

4. करुण रस की परिभाषा :-

करुण रस का स्थायी भाव शोक होता है करुणा रस में, किसी का विनाश या स्वयं से अलगाव, तरलता का विनाश और प्रेमी से अलगाव का दुख या दर्द उत्पन्न होता है। उसे करुण रस कहा जाता है।

करुण रस के उदाहरण :-

मणि खोये भुजंग-सी जननी,
फन-सा पटक रही थी शीश,
अन्धी आज बनाकर मुझको,
क्या न्याय किया तुमने जगदीश।

5. शांत रस की परिभाषा

शांत रस का स्थायी भाव निर्वेद होता है। शांत रस में तात्विक ज्ञान की प्राप्ति या संसार से वैराग्य होने पर, परम आत्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान प्राप्त करने पर मन को जो शांति मिलती है, वहां शांत रस उत्पन्न होता है।

शांत रस के उदाहरण 

जब मै था तब हरि नाहिं अब हरि है मै नाहिं,
सब अँधियारा मिट गया जब दीपक देख्या माहिं।

6. अदभुत रस की परिभाषा

अदभुत रस का स्थायी भाव आश्चर्य होता है। जब किसी व्यक्ति के मन में अजीबोगरीब या आश्चर्यजनक चीजें देखकर विस्मय आदि की भावना पैदा होती है, तो उसे अद्भुत रस कहा जाता है। इसमें रोमांच, चक्कर आना, कांपना, आंखों में आंसू आदि की भावनाएं व्यक्त की जाती हैं।

अदभुत रस के उदाहरण :-

देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया,
क्षणभर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया।

7. भयानक रस की परिभाषा

भयानक रस का स्थायी भाव भय होता है। जब किसी भयानक अथवा अनिष्टकारी व्यक्ति या वस्तु को देखने अथवा उससे सम्बंधित वर्णन करने या किसी अनिष्टकारी घटना का स्मरण करने से मन में जो व्याकुलता जागृत होती है उसे भय कहा जाता है, तथा उस भय के उत्पन्न होने के कारण जिस रस कि उत्पत्ति होती है उस रास को भयानक रस कहा जाता है। इसके अंतर्गत पसीना छूटना,कम्पन, चिन्ता, मुँह सूखना, आदि के भाव उत्पन्न होते हैं।

भयानक रस के उदाहरण :-

एक ओर अजगर हिं लखि एक ओर मृगराय,
विकल बटोही बीच ही, पद्यो मूर्च्छा खाय।

8. रौद्र रस की परिभाषा

रौद्र रस का स्थायी भाव क्रोध है, अर्थात जब एक पक्ष या व्यक्ति दूसरे पक्ष या अन्य व्यक्ति का अपमान करता है या अपने शिक्षक आदि की निन्दा के कारण उत्पन्न होने वाला क्रोध, रौद्र रस कहलाता है।

रौद्र रस के उदाहरण :-

उस काल मरे क्रोध के तन काँपने उसका लगा
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा।

9.वीभत्स रस की परिभाषा

वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा होता है। इसमें घृणित वस्तुओं, घृणित चीजो या घृणित व्यक्ति को देखकर अथवा उनके संबंध में विचार करके अथवा उनके सम्बन्ध में सुनकर मन में उत्पन्न होने वाली घृणा या ग्लानि ही वीभत्स रस कि पुष्टि करती है।

वीभत्स रस के उदाहरण :-

बहु चील्ह नोंचि ले जात तुच, मोद मठ्यो सबको हियो
जनु ब्रह्म भोज जिजमान कोउ, आज भिखारिन कहुँ दियो।

10. वात्सल्य रस की परिभाषा

वात्सल्य रस का स्थायी भाव वात्सल्य रति होता है। इस रस में बड़ों का बच्चों के प्रति प्रेम,माता का पुत्र के प्रति प्रेम, बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति प्रेम, गुरुओं का शिष्य के प्रति प्रेम आदि का भाव स्नेह कहलाता है यही स्नेह का भाव परिपुष्ट होकर वात्सल्य रस कहलाता है।

वात्सल्य रस के उदाहरण उदाहरण :-

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै, दुलरावै मल्हावै, जोइ सोइ, कछु गावै।

11. भक्ति रस की परिभाषा

भक्ति रस का स्थायी भाव देव रति होता है, इस रस में ईश्वर के प्रेम और स्नेह का वर्णन किया गया है। अर्थात् इस रस में ईश्वर के प्रति प्रेम का वर्णन किया जाता है।

भक्ति रस के उदाहरण :-

एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास,
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास। 


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Ras ki paribhasha - यदि आप रस पढ़ना चाहते हैं तो यहाँ पर रस क्या है, अंग, प्रकार, उदाहरण सहित प्रकाशित किया गया है। चलिये सबसे पहले यह जान लेते हैं कि रस किसे कहते हैं।


रस किसे कहते हैं | Ras kise kahate hain

रस जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होता है सुख, आनंद, मजा इत्यादि। इस प्रकार रस का शाब्दिक अर्थ होता है "आनंद"

इसलिए हम रस की परिभाषा कुछ इस प्रकार दे सकते हैं 

Ras Kise Kahate Hain- 'किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर मन में जो आनंद का भाव उत्पन्न होता है, उसे रस कहते हैं।'

Ras kise kahate hain


रस के  कितने अंग होते हैं | Ras ke Ang

रस के चार अंग होते है, जो निम्नलिखित हैं।
  1. स्थाई भाव
  2. अनुभाव
  3. विभाव
  4. संचारी भाव

1. स्थाई भाव क्या है

स्थाई भाव का अर्थ होता है प्रधान भाव। प्रधान भाव वही हो सकता है जो रस की अवस्था तक पहुंचता है। काव्य या नाटक में शुरू से आखिर तक एक स्थाई भाव होता है। स्थाई भाव की संख्या 9 मानी गई है। स्थाई भाव ही रस का आधार है। एक रस के मूल में एक स्थाई भाव रहता है। 

अतः रसों की संख्या भी 9 होती है। इन्हें नवरस भी कहते हैं। मूल रूप से नवरस ही माने जाते हैं। बाद में आचार्यों ने दो और भावों (वात्सल्य व भगवत विषयक रति) को स्थाई भाव के रूप में मान्यता दी। इस प्रकार स्थाई भाव की संख्या 11 तक पहुंच जाती है और तदनुरूप रसों की संख्या भी 11 तक पहुंच जाती है।


2. अनुभाव क्या है

मनोगत भावनाओं को व्यक्त करने वाले शरीर-विकार अनुभव कहलाते हैं।  अनुभवों की संख्या 8 मानी जाती है।
  1. स्तंभ
  2. स्वेद
  3. रोमांच
  4. स्वर भंग
  5. कम्प
  6. विवर्णता
  7. अश्रु
  8. प्रलय

3. विभाव क्या है

स्थाई भावों के उद् भोदक कारण को विभाव कहते हैं। विभाग दो प्रकार के होते हैं।
  • आलंबन विभाव
  • उद्दीपन विभाव

i. आलम्बन विभाव:

जिसका आलम्बन या सहारा पाकर स्थायी भाव जगते है आलम्बन विभाव कहलाता है। जैसे नायक- नायिका। आलम्बन विभाव के दो पछ होते हैं-आश्रयालंबन व विसयालम्बन। जिसके मन में भाव जगे वह आश्रयालंबन व जिसके प्रति या जिसके कारणं भाव जगे वह विसयालम्बन कहलाता है।

जैसे :- यदि राम के मन में सीता के प्रति रति का भाव जगता है तो राम आश्रय होंगे और सीता विषय।

ii. उद्दीपन विभाव:-

-जिन वस्तुओं या परिस्थितियों को देखकर स्थाई भाव उद्दीप्त होने लगता है उद्दीपन विभाव कहलाता है।

जैसे :- चांदनी, कोकिल कूजन, एकांत स्थल, रमणीक उद्यान, नायक या नायिका की शारीरिक चेस्टाऐं

4. संचारी भाव क्या है

मन में संचरण करने वाले (आने- जाने वाले ) भावों को संचारी या व्यभिचारी भाव कहते हैं। संचारी भावों की कुल संख्या 33 मानी गई है।

निर्वेद, ग्लानि, शंका, असूया, मद, श्रम, आलस्य, देन्य, चिंता, मोह, स्मृति, घृति, ब्रीडा, चपलता, हर्ष, आवेग, जड़ता, गर्व, विषाद, औत्सुक्य, निद्रा, अपस्मार, स्वप्न, विबोध, अमर्ष, अविहित्था, उग्रता, मति, व्याधि, उन्माद, मरण, वितर्क

रस के प्रकार |  Ras ke Prakar

रसों की संख्या 9 है। वास्तव में रस नौ ही प्रकार के होते हैं परन्तु वात्सल्य एवं भक्ति को भी रस माना गया हैं इसलिए रसों की संख्या 11 हो जाती है।

1. श्रंगार रस

2. हास्य रस

3. वीर रस

4. करुण रस

5. शांत रस

6. अदभुत रस

7. भयानक रस

8. रौद्र रस

9. वीभत्स रस

10. वात्सल्य रस

11. भक्ति रस


दोस्तो उम्मीद करता हूँ कि आप जान गए होंगे कि रस की किसे कहते हैं और रस के कितने अंग होते हैं। आप यहाँ पर व्याकरण से सम्बंधित और भी टॉपिक हिंदी में पढ़ सकते हैं।

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दोस्तो यदि आप समझ के बारे में विस्तार से पढ़ना चाहते हैं तो आप सही जगह हैं। क्योंकि इस लेख समास क्या है, समास विग्रह क्या है, समास के कितने भेद होते हैं इत्यादि का वर्णन विस्तृत रूप से किया गया है।

समास क्या है | Samas Kya hai

जहाँ पर अधिक से अधिक अर्थ को कम-से-कम शब्दों में
प्रकट किया जाए वह समास कहलाता है।

Samas Kise Kahate Hain | Samas Ki Paribhasha

समास की परिभाषा - जब दो या दो से अधिक शब्दों से मिलकर जो नया और छोटा शब्द बनता है उस शब्द को समास कहते हैं। 

समास क्या है - परिभाषा, भेद तथा उदाहरण
समास क्या है - परिभाषा, भेद तथा उदाहरण

समास विग्रह क्या है | समास विग्रह किसे कहते हैं

संपूर्ण पद के सभी पदों को अलग करने की प्रक्रिया को समास-विग्रह या व्यास कहा जाता है।

समास विग्रह के उदाहरण

नीलकमल का विग्रह है- "नीला है जो कमल"
चौराहा का विग्रह है - चार राहों का समूह।

• समास रचना में प्रायः दो पद होते हैं। पहले को पूर्व पद और दूसरे को कहा जाता है।

उदाहरण:- "राजपुत्र" में पूर्वपद "राज" है और उत्तरपद "पुत्र" है।

• समास प्रक्रिया में पदों के बीच की विभक्तियां लुप्त हो जाती हैं।

उदाहरण:- राजा का पुत्र =राजपुत्र, यहाँ पर विभक्ति का लोप हो गया है।

हम लोग समास की परिभाषा जान गए। आइये अब हम जान लेते हैं कि समास के कितने भेद के होते हैं।


Samas ke kitne bhed hote hai | समास के भेद

समास के मुख्यतः 6 भेद होते हैं जो निम्नलिखित हैं।

  1. अव्ययीभाव समास
  2. तत्पुरुष समास
  3. कर्मधारय समास
  4. द्विगु समास
  5. द्वंद्व समास
  6. बहुव्रीहि समास

ये समास के मुख्य 6 भेद हैं। आइए हम एक-एक करके इन सभी समास के बारे में जान लेते हैं।


1. अव्ययीभाव समास किसे कहते हैं | Avyayibhav samas

अव्ययीभाव समास की परिभाषा- इस समास में शब्द का प्रथम पद अव्यय होता है और उसका अर्थ प्रधान होता है, इसीलिए इसे अव्ययीभाव समास कहा जाता है।
अव्यय, यानी जिस पद का प्रारूप लिंग, वचन और कारक की स्थिति में एक समान ही रहे।

अव्ययीभाव समास का उदाहरण

प्रतिदिन = प्रत्येक दिन
यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार
आजन्म = जन्म से लेकर

यहाँ प्रति, यथा, आ आदि कुछ अव्यय हैं। स्त्रीलिंग या पुल्लिंग के साथ प्रयोग करने पर इन शब्दांशों में कोई परिवर्तन नहीं आएगा।


2. तत्पुरुष समास किसे कहते हैं | Tatpurush Samas

तत्पुरुष समास की परिभाषा- जिस समास में दूसरा पद प्रधान होता है, उसे तत्पुरुष समास कहा जाता है। यह कारक से जुड़ा होता है। विग्रह करने पर जो कारक प्रकट होता है, उसी कारक के अनुसार समास का उप-प्रकार निर्धारित किया जाता है। इस समास में दो पदों के बीच कारक को चिन्हित करने वाले शब्दों का लोप हो जाता है, इसीलिए इसे तत्पुरुष समास कहा जाता है।

तत्पुरुष समास के उदाहरण

तुलसी द्वारा कृत = तुलसीकृत
राजा का महल = राजमहल
देश के लिए भक्ति = देशभक्ति
राह के लिए खर्च = राहखर्च


तत्पुरुष समास के कितने भेद होते हैं | Tatpurush Samas Ke Bhed

तत्पुरुष समास के 6 प्रकार होते हैं जो निम्नलिखित हैं

i. कर्म तत्पुरुष समास
ii. करण तत्पुरुष समास
iii. सम्प्रदान तत्पुरुष समास
iv. अपादान तत्पुरुष समास
v. सम्बन्ध तत्पुरुष समास
vi. अधिकरण तत्पुरुष समास

चलिए तत्पुरुष समास के निम्न 6 भेद को थोड़ा सा समझ लेते हैं।

i. कर्म तत्पुरुष समास की परिभाषा

जहाँ दो पदों के बीच कर्म कारक चिन्ह छुपा होता है, उसे कर्म तत्पुरुष समास कहते हैं।

उदाहरण:-
रथचालक – रथ को चलाने वाला।
माखनचोर – माखन को चुराने वाला।
जनप्रिय – जनता को प्रिय।


ii. करण तत्पुरुष समास की परिभाषा

जहाँ दो पदों के बीच करण कारक का बोध होता है, उसे करण तत्पुरुष समास कहते हैं। इसमें करण कारक का चिन्ह ‘के द्वारा’ और ‘से’ होता है।

उदाहरण:-
स्वरचित – स्वयं द्वारा रचित,
शोकग्रस्त – शोक से ग्रस्त


iii. सम्प्रदान तत्पुरुष समास की परिभाषा

इसमें दो पदों के बीच सम्प्रदान कारक छिपा होता है। सम्प्रदान कारक का चिन्ह ‘के लिए’ है।

उदाहरण:-
विद्यालय =विद्या के लिए आलय (घर)
सभाभवन = सभा के लिए भवन


iv. अपादान तत्पुरुष समास की परिभाषा

अपादान तत्पुरुष समास में दो पदों के बीच में अपादान कारक चिन्ह ‘से’ (विभक्ति के संदर्भ में या अलग होने पर) छिपा होता है।

उदाहरण:-
कामचोर = काम से जी चुराने वाला
दूरागत = दूर से आगत
रणविमुख = रण से विमुख


v. सम्बन्ध तत्पुरुष समास की परिभाषा
उत्तर और पूर्व पद के बीच सम्बन्ध कारक के चिन्हों, जैसे कि ‘का’, ‘की’, ‘के’, ‘रा’ , ‘री’, ‘रे’, ‘ना’ , ‘नी’, ‘ने’ आदि के छुपे होने पर सम्बन्ध तत्पुरुष समास होता है।

उदाहरण:-
गंगाजल =गंगा का जल


vi.अधिकरण तत्पुरुष समास की परिभाषा

अधिकरण तत्पुरुष में दो पदों के बीच अधिकरण कारक छिपा होता है। अधिकरण कारक का चिन्ह या विभक्ति ‘ में’, ‘पर’ होता है।

उदाहरण:-
कार्यकुशल = कार्य में कुशल
वनवास = वन में वास


3. कर्मधारय समास किसे कहते हैं | Karmdharay Samas ki Paribhasha

कर्मधारय समास की परिभाषा- जिस समास में उत्तर पद प्रधान होता है और शब्द विशेषण – विशेष्य और उपमेय – उपमान से जुड़कर बनते हैं, उसे कर्मधारय समास कहते हैं

कर्मधारय समास के उदाहरण

चरणकमल = कमल के समान चरण
नीलगगन = नीला है गगन जो
चन्द्रमुख = चन्द्र जैसा मुख


4. द्विगु समास किसे कहते हैं | Dvigu Samas ki Pribhasha

द्विगु समास की परिभाषा- द्विगु समास में उत्तर पद प्रधान होता है और पूर्व पद संख्यावाचक होता है।

द्विगु समास के उदाहरण
जैसे: तीन लोकों का समाहार = त्रिलोक
पाँचों वटों का समाहार = पंचवटी
तीन भुवनों का समाहार =त्रिभुवन

5. द्वंद्व समास किसे कहते हैं | Dwand Samas ki Pribhasha

द्वंद्व समास में दोनों ही पद प्रधान रहते हैं और अधिकतर एक-दूसरे पद के विपरीत होते हैं। कोई भी पद छुपा हुआ नहीं रहता है।

द्वंद समास के उदाहरण
जलवायु = जल और वायु
अपना-पराया = अपना या पराया
पाप-पुण्य = पाप और पुण्य


6. बहुब्रीहि समास किसे कहते हैं | Bahubrihi Samas

जिस समास में कोई भी पद प्रधान ना हो या दो पद मिलकर तीसरा पद बनाते हों और वह तीसरा पद प्रधान होता है, उसे बहुब्रीहि समास कहते हैं।

बहुब्रीहि समास के उदाहरण
त्रिनेत्र = तीन हैं नेत्र जिसके (शिव)
लम्बोदर = लम्बा है उदर जिसका (गणेश)


अंतिम शब्द-

उम्मीद करता हूं कि आप व्याकरण के मुख्य टॉपिक समास क्या है, परिभाषा तथा समास के भेद उदाहरण सहित समझ गए होंगे यदि आपका किसी प्रकार का सुझाव या सवाल हो तो आप हमें कमेंट कर कर बता सकते हैं।

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उपसर्ग : इस लेख में हम उपसर्ग के बारे में जानेंगे जैसे कि उपसर्ग किसे कहते हैं, उपसर्ग के उदाहरण तथा उपसर्ग (upasarg) कितने प्रकार के होते हैं। 


उपसर्ग किसे कहते हैं | Upasarg kise kahate hain

उपसर्ग की परिभाषा: वे शब्दांश जो किसी शब्द के आरंभ में लगाने पर उसके अर्थ में विशेषता लाते हैं या उसका अर्थ बदलने के लिए लगाए जाते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं।

उपसर्ग किसे कहते हैं
उपसर्ग की परिभाषा


उपसर्ग के उदाहरण

परा+कर्म = पराकर्म

परा+जय = पराजय

परा+भव = पराभव

परा+धीन = पराधीन

परा+भूत = पराभूत आदि।


उपसर्ग कितने प्रकार के होते हैं | Upasarg ke prakar

उपसर्ग चार प्रकार के होते है जो निम्नलिखित हैं--

  1. संस्कृत के उपसर्ग
  2. हिंदी के उपसर्ग
  3. उर्दू और फारसी के उपसर्ग
  4. अंग्रेजी के उपसर्ग


1. संस्कृत के उपसर्ग- अप, अभि, अव, आ, अति, अधि, अनु, उप, दुर्, दुस्, उत्, उद्, निर्, निस्, नि, परा, परि, प्र, प्रति, वि, सम्, सु

2. हिंदी के उपसर्ग- अ, अन, क, कु, दु, बिन, नि, औ/अव, भर, सु, अध्, उन, पर

3. उर्दू और फारसी के उपसर्ग- ला, बद, बे, कम, गैर, खुश, ना, अल, बर, बिल, हम, दर, फिल/फी, ब, बा, सर, बिला, हर

4. अंग्रेजी के उपसर्ग- सब, डिप्टी, वाइस, जनरल, चीफ, हेड

उप, दुर्, दुस्उम्मीद है कि आप उपसर्ग की परिभाषा तथा उपसर्ग के प्रकार समझ गए होंगे आपको यह आलेख कैसा लगा हमें जरूर बताएं।


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